Thursday, October 30, 2008

कितनी उचित है दीपावली

मैंने इस बार दीवाली नहीं मनाई है । मुझे कोई उपयुक्त कारण नज़र नहीं आया।
पिछले वर्ष की दिसम्बर माह की विज्ञानं प्रगति में मैंने लिखा भी था-
राष्ट्रीय त्यौहार देश का पर क्ष्रद्धा मतवाली।
कितना पर्यावरण प्रदुषण फैलाती दीवाली
/

yah गीत सम्पादकीय पृष्ट पर प्रकाशित हुआ था जो काफी समय तक चर्चा में रहा। इस गीत ने स्वयम लिखने वाले तक की भावनाओं को बदल के रख दिया.कुछ लोग धार्मिक कारण बताते है। आस्था का कोई इतिहास नही है। हम रावन को हर बार जलाते हैं और हमारे अन्तर मन का रावन आज भी अट्टहास कर रहा है। रावन को बार बार जला के हम क्या साबित करना चाहते हैं यदि आप यह कहते हो की वह बुराई का प्रतीक है तो आज बुराई के प्रतीकों की कोई कमी नही। फ़िर यह दोष हर बार रावन पर ही क्यो मढा जाता है। रावन एक विद्वान् पुरूष था। इस बात को क्यों नज़रंदाज़ किया जाता है। राम हजारों लंकावासियों का कत्ल कर के आए थे जिसकी खुशी में हम दीवाली जलाते हैं? रावन दहन को एक उत्सव के तरीके से मनाया जाता है। यू तो हिंदू धर्म में शव को जलाने के बाद शुद्धिकरण का भी प्रावधान है। और हम मौज मना के चले
आते है. कितना मजा आता है हमें किसी को जलाने में? क्या ये हिंदू धर्म की बर्बरता नहीं है?
मेरे दीवाली न मनाने पर तमाम तरह की बातें लोग कह रहे है। भले ही बजरंग दल और विहिप वाले मेरे दुश्मन हो जाए पर मै अपनी बात पर अडिग हूँ। मै चाहता हूँ अगर आप इस ब्लॉग को पढ़े तो इस पर विचार अवश्य करें
अगर मै ग़लत हूँ तो भी आप मुझे ज़रूर बताएं

2 comments:

Anonymous said...

you are right

Unknown said...

aaj se mera bhee divalee manana band